क्रूड ऑयल सस्ता, लेकिन पेट्रोल-डीजल के दाम अभी जस के तस
अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार गिर रही हैं, लेकिन भारत में फिलहाल पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कोई राहत नहीं मिली है।
नई दिल्ली: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते पर सहमति बनने के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में स्थिरता लौटती दिखाई दे रही है, जिसका सीधा असर क्रूड ऑयल की कीमतों पर पड़ा है।
बुधवार को कच्चे तेल की कीमत घटकर करीब 77.51 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई, जो कई महीनों के निचले स्तर के करीब है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शांति प्रक्रिया आगे बढ़ती है तो आने वाले दिनों में कीमतों में और गिरावट देखने को मिल सकती है।
युद्ध के दौरान आसमान छू गई थीं कीमतें
मध्य-पूर्व में तनाव बढ़ने के दौरान मार्च 2026 में अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें 126 से 138 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं। वहीं अमेरिकी बेंचमार्क वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) भी 113 से 114 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गया था।
हालांकि अब हालात सामान्य होने के संकेतों के बीच बाजार में राहत दिखाई दे रही है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह गिरावट?
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। देश अपनी आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल, 50 प्रतिशत एलएनजी और 60 प्रतिशत एलपीजी विदेशों से खरीदता है।
ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में गिरावट भारत के आयात बिल को कम करने में मदद कर सकती है। इससे सरकारी वित्तीय दबाव भी घट सकता है।
फिर भी पेट्रोल-डीजल क्यों नहीं हुए सस्ते?
हालांकि कच्चा तेल सस्ता हुआ है, लेकिन इसका फायदा तुरंत उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंचता।
पिछले चार महीनों के दौरान तेल कंपनियों ने अलग-अलग चरणों में पेट्रोल की कीमतों में करीब 8 रुपये प्रति लीटर और डीजल की कीमतों में लगभग 7.50 से 8 रुपये प्रति लीटर तक बढ़ोतरी की थी।
विशेषज्ञों का कहना है कि तेल कंपनियां पहले अपने घाटे की भरपाई करने की कोशिश करती हैं, जिसके बाद ही कीमतों में कटौती का फैसला लिया जाता है।
तेल कंपनियां अब भी दबाव में
पेट्रोलियम मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, सरकारी तेल कंपनियों पर अभी भी वित्तीय दबाव बना हुआ है।
अनुमानित अंडर-रिकवरी इस प्रकार है:
- एलपीजी सिलेंडर पर लगभग 700 रुपये प्रति सिलेंडर
- डीजल पर लगभग 27 रुपये प्रति लीटर
- पेट्रोल पर लगभग 3 रुपये प्रति लीटर
यानी कई बार कीमतें बढ़ाने के बावजूद तेल कंपनियों को प्रतिदिन करोड़ों रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है।
भारत ने बदली आयात रणनीति
मध्य-पूर्व में तनाव बढ़ने के बाद भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए आयात के स्रोतों में विविधता लाने की रणनीति अपनाई है।
सरकार और तेल कंपनियों ने कई नए देशों से पेट्रोलियम उत्पादों की खरीद शुरू की है। हालांकि इससे सप्लाई तो सुरक्षित हुई है, लेकिन परिवहन और आयात लागत में भी बढ़ोतरी हुई है।
आगे क्या?
यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक निचले स्तर पर बनी रहती हैं, तो आने वाले समय में भारत में पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की कीमतों में राहत मिलने की संभावना बढ़ सकती है। हालांकि फिलहाल उपभोक्ताओं को कीमतों में तत्काल कटौती के लिए इंतजार करना पड़ सकता है।









