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HomeBusinessईरान अमेरिका समझौते को अपनी जीत क्यों बता रहा है? जानिए इसके पीछे की राजनीतिक रणनीति

अमेरिका के साथ हुए मेमोरेंडम ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग (एमओयू) को ईरान का नेतृत्व एक बड़ी कूटनीतिक सफलता और अपनी जीत के रूप में पेश कर रहा है। ईरानी सरकार इसे पीछे हटने की मजबूरी नहीं, बल्कि वर्षों के प्रतिरोध और दबाव की राजनीति का परिणाम बता रही है।

हालांकि, इस दावे को देश की जनता और राजनीतिक विरोधियों के बीच स्वीकार करवाना आसान नहीं है।

युद्ध और आर्थिक संकट के बीच समझौता

ईरान हाल ही में एक विनाशकारी संघर्ष और लंबे आर्थिक दबाव से उभरा है। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों, महंगाई और घरेलू असंतोष ने आम लोगों की परेशानियां बढ़ा दी हैं।

ऐसे समय में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह जनता को विश्वास दिलाए कि अमेरिका के साथ हुआ समझौता किसी तरह की कमजोरी नहीं, बल्कि देश के हित में उठाया गया रणनीतिक कदम है।

सरकार क्यों बता रही है इसे जीत?

ईरानी नेतृत्व लंबे समय से यह संदेश देता रहा है कि उसने बाहरी दबाव के आगे झुकने के बजाय अपने सिद्धांतों पर कायम रहते हुए बातचीत की है।

इसी कारण अब सरकार इस समझौते को अपनी कूटनीतिक जीत के तौर पर प्रस्तुत कर रही है।

ग़ालिबाफ़ ने कहा- अंतिम जीत की ओर बढ़ा ईरान

ईरानी संसद के अध्यक्ष और वार्ता प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाने वाले Mohammad Bagher Ghalibaf ने कहा कि ईरान ने “अंतिम जीत की दिशा में एक लंबा कदम बढ़ाया है।”

उनका बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि उन्हें राष्ट्रपति के उदारवादी खेमे का हिस्सा नहीं माना जाता।

राष्ट्रपति पेज़ेश्कियान ने दिखाया बड़े बदलाव का सपना

ईरान के राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian ने इस समझौते को देश के लिए बड़े बदलाव का अवसर बताया।

उन्होंने कहा कि यदि समझौते को पूरी तरह लागू किया गया, तो इससे ईरान की कई पुरानी समस्याओं का समाधान हो सकता है और ईरान के साथ पूरे मध्य पूर्व में एक नई परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं।

विरोध भी कम नहीं

ईरान के भीतर और बाहर ऐसे कई समूह मौजूद हैं जो इस समझौते को सकारात्मक कूटनीतिक उपलब्धि नहीं मानते। कुछ लोग इसे शासन परिवर्तन का अवसर मान रहे हैं, जबकि कट्टरपंथी वर्ग लंबे समय से अमेरिका के साथ किसी भी प्रकार के समझौते का विरोध करता रहा है।

इसी राजनीतिक विरोधाभास के बीच ईरानी नेतृत्व इस समझौते को अपनी जीत के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार इस नैरेटिव को जनता के बीच सफलतापूर्वक स्थापित कर पाएगी, या आर्थिक और राजनीतिक चुनौतियां इस दावे को कमजोर कर देंगी।

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Posted By City Home News

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